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Saturday, 13 August 2011

एक गाँव के दायरे से कुछ सांस्कृतिक चिंताएँ

जहाँ की धूल, मिट्टी, पानी और आबोहवा में खेलते-धूपते बड़ा हुआ वहाँ आज खुद को मैं अजनबी की तरह भौंचक्क और असहाय पाता हूँ। समझ में ही नहीं आता कि चालीस साल पहले मिथिलांचल के जिस कोसी क्षेत्र में मेरा जन्म हुआ था वह दो-ढाई दशक में इतना अपरिचित क्यों और कैसे हो गया!...बदलाव प्रकृति का नियम है और उसकी एक सातत्य प्रक्रिया होती है, लेकिन वहाँ जो बदलाव दिख रहा है वह प्रकृति विरुद्ध तो है ही, उसकी प्रक्रिया भी इतनी अराजक, दिशाहीन और विस्मयकारी है कि आसानी से बयान नहीं किया जा सकता।

ऐसा नहीं कि पहले यह क्षेत्र खूब धन्य-धान्य या स्वर्ग था! अहा, ग्राम्य जीवन क्या है जैसी कोई बात कभी नहीं थी!...तब भी यहाँ भयंकर 'दरिद्रा' बास करती थी। नरक से भी नारकीय स्थितियाँ थीं। गाँव क्या, निकट आसपास भी न कोई स्कूल था न अस्पताल। पक्की सड़क या बिजली के बारे में तो हमने दस-बारह साल की उम्र तक कुछ सुना भी नहीं था। गाँव के आगे-पीछे नदियाँ थीं जिनमें काफी दूर तक कोई पुल नहीं था। हर तरफ जंगल था, अंतहीन सा। कहीं-कहीं बाँस, इक्के-दुक्के फलदार पेड़—ज़्यादातर खैर, साहुड़, बबूल जैसे पेड़ों के झुरमुट साँप, सनगोह, बिच्छू, नेवले, गीदड़ से भरा। परती पलार झौआ-कास-पटेर के झाड़ों से आबाद। उपजाऊ ज़मीन नाम मात्र थी। गाँव-भर का हाल तब यह था कि साल-भर में डेढ़ सौ से ज़्यादा दिन चावल-गेहूँ (यानी भात-रोटी) नसीब नहीं होता था। साल के दो सौ से ज़्यादा दिन लोग उबले अल्हुए (शकरकंदी), उबली हुई खेसाड़ी-कुरथी और बाजरे-जनेर या कौन-चीन-जौ जैसे अनाज के सहारे काटते थे। मछली, खरगोश, कछुआ, बनमुर्गी, बटेर, लालसर, पड़ौकी जैसे जीवों के मांस तो लोग खाते थे, मगर उन्हें बनाने के लिए तेल-मसाले के लाले पड़ते थे। जीरा गिनकर और तेल बूँद के हिसाब से खर्च करने का चलन था। पूरे गाँव में एक सेट से ज़्यादा कपड़े तब नव विवाहिताओं को छोड़ प्राय: किसी के पास नहीं होते थे। बर्तनों का हाल यह था कि एक-दो से ज़्यादा मेहमान आने पर लोग पड़ोस के आँगन से थालियाँ माँगकर लाते थे। बीमारों का इलाज पथ्य-परहेज के अलावा घरेलू ढंग के उपचारों से ही होता था। झोलाछाप डॉक्टर भी तब आज के जितने सुलभ नहीं थे। थे तो झाड़-फूँक और टोटके थे। फुर्सत के इफरात क्षण थे और थी गप्पबाज़ी। हँसी तब सिर्फ होंठों से नहीं भीतर से खिलखिलाकर छलकती थी। 

तब व्रत-उपवास दिन काटने के लिए अन्न बचाने का तरीका लगता था। ईश्वर का नाम तब संकट के दिन गुज़ारने जैसी स्थिति में बल देने वाली अदृश्य शक्ति से ज़्यादा महत्त्व नहीं रखता था। पर्व-त्योहार तो थे, मगर ढकोसले और अंधविश्वास ज़रा कम ही थे। धर्म और ईश्वर को लेकर लडऩे-भिडऩे की स्थिति तो बिल्कुल ही नहीं थी। ईश्वर और धर्म की दुकान तब अपने गाँव की सीमान से दूर तक नहीं दिखती थी। एक ग्रामदेवता का थान (स्थान) शीशम के झुरमुट में ज़रूर था, मगर वहाँ भी साल में सिर्फ एक बार लोग जुटते थे। घंटे-भर के कीर्तन के बाद हरेक घर से भेजे गए एक-एक मुट्ठी चावल, कुछ केले और एकाध किलो दूध से बनी साझी खीर का प्रसाद लेकर सभी राज़ी-खुशी अपने घर लौटते थे। सामूहिकता की भावना संबंधों को आधार देती थी। कुटुम्बों का सत्कार और सम्मान एक घर मात्र का नहीं, गाँव-भर का फ़र्ज़ था। किसी एक की उपलब्धि का सुख गाँव-भर को सुख पहुँचाता था।...

मगर आज अपने उसी गाँव में मैं खुद को भौचक्क, असहाय और अजनबी महसूस कर रहा हूँ। उसी गाँव में जहाँ मैंने अपनी ज़िन्दगी के आधे से अधिक दिन गुज़ारे हैं। जहाँ वर्षों तक गाय-भैंस चराया। जहाँ से खेती-बाड़ी करते, मछलियाँ पकड़ते स्कूल का रास्ता तलाशा। जहाँ से चलकर बाहरी दुनिया से नाता जोड़ा।  उसी गाँव में मैं एकाकी हूँ जहाँ की धूल, मिट्टी, पानी और हवा मेरी रग-रग में बसी है और जिनके बिना मेरा अनुभव-संसार शून्य है।...

आज मैं अपने उसी कालिकापुर गाँव में बाहरी व्यक्ति हूँ।...

जनपद के बाहर सर्वप्रथम अठारह वर्ष की उम्र में 1987 में प्रवास पर निकला था। भागलपुर, पटना, सरहसा, दरभंगा, मधुबनी और गाँव...यानी 1995 तक ज़्यादातर वक्त बिहार की सीमा के भीतर ही अध्ययन और अन्य संघर्षों में गुज़रा।... सो कहा जा सकता है कि 1995 तक गाँव से जुड़ाव हर स्तर पर ज़्यादा था। यहाँ यह भी कहना चाहूँगा कि बदलाव की बयार उसी दौर में शुरू हो गई थी जब प्राय: देश के और-और गाँव भी बदलने की ओर अग्रसर हुआ होगा। इंदिरा जी के काल में 20 सूत्री कार्यक्रमों के माध्यम से गाँव में सरकारी धन ने 'लूट और फूट' की एक नींव रखी थी। राजीव युग तक और-और सब्सिडी स्कीमों ने इस व्याधि को चारों तरफ फैलाया। 
उसी दौर में बिहार में तथाकथित संस्कृत शिक्षा को बढ़ावा देने की एक सरकारी योजना के तहत मेरे गाँव में भी मेरे पितामह के नाम से एक संस्कृत मध्य विद्यालय खुला। पिछले सत्ताइस-अट्ïठाइस वर्षों में उस विद्यालय ने साक्षर तो एक व्यक्ति को भी नहीं किया, लेकिन उस स्कूल से अन्य गाँवों के पाँच जनों के साथ ही एक ग्रामीण भी 'मास्टर साहेब' कहलाने लगे। जो और लोग 'मास्टर साहेब' नहीं बन पाए उनके साथ स्थानीय स्तर से कोर्ट-कचहरी तक जंग चली। और इन जंगों और कई अन्य बदलावों का प्रभाव कह सकते हैं कि आज वहाँ घर-घर में जंग छिड़ी है।

जंगलों की कटाई-सफाई 1982-83 के बीच शुरू हुई और 1986-87 तक पूरा इलाका लगभग उजाड़ हो गया था। 1990-91 तक आते-आते तो लगभग ऐसी विरानी फैल गई थी कि पहले के भौगोलिक परिवेश की कल्पना तक अविश्वसनीय लगने लगी थी। यह अभियान दरअसल खेती योग्य ज़मीन तैयार करने जैसे किसानों के नेक इरादे से जुड़ा था। उन किसानों को यह पता नहीं था कि खेती इस कदर बेमानी हो जाएगी, जैसी कि हुई। सरकार की कोसी सिंचाई परियोजना बिल्कुल असफल साबित हुई। उसके बाद सरकारी स्तर पर किसानों को सुविधा, सहायता देने या जागरूक बनाने को लेकर कोई ईमानदार कोशिश ही नहीं हुई। गाँव के हृदय पर मृत अजगर की तरह वह नहर आज भी लेटी हुई है जिसमें पानी कभी आया ही नहीं।

उस मरी हुई नहर और मरे हुए-से स्कूल (जहाँ मास्टर साहेब लोग कभी-कभार बैठकर खैनी खाते और गप्प हाँकते हैं) के अलावा उस गाँव के भीतर पिछली सदी में सरकारी योजनाओं से और कुछ दिखने लायक हुआ ही नहीं। हाँ, जब खेती लगातार घाटे का सौदा ही बनती गई तो लोगों ने बाहर ताक-झाँक करना शुरू कर दिया। पहले यहाँ सूचना का स्रोत रेडिया मात्र था। फिर बाहर से लौटे लोगों का अनुभव भी नई-नई बातें गाँव की हवा में फैलाने लगा। फिर बैट्री पर चलनेवाला टीवी भी गाँव की सीमा में प्रवेश कर गया। जिसके साथ-साथ फैलते गए पलायन और बाज़ार के वायरस!...1995 के बाद से मैं दिल्ली-गाजि़याबाद रह रहा हूँ। लेकिन साल में एक-दो बार कुछ दिनों के लिए वहाँ जाता ही रहा। कुछ दफा तो लगभग एक महीना भी रहा। फिर भी धीरे-धीरे हर बार कुछ ज़्यादा ही बेगानगी बढ़ती गई और आज स्थिति ऐसी हो गई कि उसका बयान करना मुश्किल लग रहा है।इस बीच पढ़े-लिखे लोग ही नहीं, अनपढ़-अशिक्षित श्रमिकजनों के साथ-साथ ऐसे तथाकथित कुलिन-मालिकान लोग भी जो गाँव में मज़दूरी नहीं करते, नगर-महानगर की तरफ झुण्डों में निकल चले हैं। मैंने 1987 में मैट्रिकुलेशन किया था। 23 साल हुए हैं। तब से आज तक गाँव की जनसंख्या दोगुनी से ज़्यादा हो गई है। सरकारी वेबसाइट भी चार सौ के लगभग जनसंख्या वाले उस गाँव की ताज़ा जनसंख्या साढ़े ग्यारह सौ बता रहा है। इस बीच आठ-दस लड़कों ने मैट्रिकुलेशन और एकाध ने ग्रेजुएशन किया है—मगर तब एक प्रतिशत लोग बाहर कमाते थे, आज पचास प्रतिशत बाहर कमा रहे हैं। आज गाँव में असहाय वृद्ध, महिलाओं और बच्चों को छोड़ कामकाजी के दर्शन दुर्लभ हो गए हैं। अब कहीं की सूचनाएँ जितनी देर में दिल्ली-कोलकाता पहुँचती हैं, उतनी ही देर में कालिकापुर भी। अब वहाँ पैसे भी पहले की अपेक्षा काफी ज़्यादा पहुँच रहे हैं। लगभग हरेक घर के एक या उससे ज़्यादा सदस्यों का किसी न किसी बैंक में एकाउण्ट है। लगभग  तीस प्रतिशत घरों की महिलाओं के नाम से भी बैंक में एकाउण्ट है। मोबाइल हर घर में। साइकिलों को कौन पूछे, कुछ मोटर गाडिय़ाँ भी हैं। तब एक भी पक्का मकान नहीं था पूरे गाँव में, आज कई पक्के मकान हैं। सीडी, डीवीडी प्लेयर के हरेक तरह के संस्करण अपना मार्ग उधर बना रहा है। गुटखा-पाउच से कोकाकोला तक अब यहाँ सहज ही 'ठंडा गरम' का परोसा बन रहा है। अब हर घर में रोज़ चावल या गेहूँ पकता है। अल्हुआ-मक्के-मड़ुआ या खेसाड़ी-कुर्थी धीरे-धीरे गायब होते जा रहे हैं। अब मछली और मांस के साधन पहले जैसे सुलभ नहीं, लेकिन उसकी खपत अलबत्ता कई गुना बढ़ गई है। ढाई सौ रुपए किलो वाले बकरे का मांस और दो सौ रुपए किलो तक बिकने वाली आंध्रा की मछलियाँ वहाँ के हाट-बाज़ारों में जितनी पहुँचतीं, सब खप जाती हैं।

वर्ष 2008 में वहाँ कोसी की भीषण बाढ़ आई थी। कई लोग तबाह और बर्बाद हो गए। कुछ लोग मरे भी। बाढ़ के बाद भीषण सूखाड़ आया। ज़मीन का जलस्रोत काफी नीचे चला गया। गाछ-बाँस सूखते गए, तालाब भर गया या सूख गया। गाँव के पश्चिम से गुज़रनेवाली सदानीरा नदी मिरचैया भी सूख गई।

फिर भी कुछ ऐसे अभागे जिनके पास बाहर कमाने लायक 'पूत'  नहीं, उनको छोड़ बाकी परिवार के ऊपर इस बाढ़ का प्रभाव कम ही मिलेगा। एकाध तो इस बाढ़ से इतने मालोमाल हुए हैं कि वे हर साल ऐसी आपदा आने की कामना कर सकते हैं। औसत और बहुतायत आमजन यदि इस आपदा से प्रभावित होकर भी अप्रभावित जैसे रह गए हैं, तो इसकी वजह है गाँव से बाहर काम करनेवाले उनके पारिवारिक जन। बात साफ है, प्रवास की कमाई पर चल रहा है यह गाँव। यही कारण है कि वहाँ घर-घर बैंक एकाउण्ट है ताकि प्रवासी पैसे का प्रवाह सहज हो सके और सरकारी योजनाओं के ड्राफ्ट भुनाने में दिक्कत न आए। लगभग एक दशक से तो इन्दिरा आवास योजना, जवाहर रोजगार योजना, आपदा राहत योजना आदि के पैसों का वैधानिक-अवैधानिक प्रवाह भी जारी रहा है।...

निश्चय ही आप सोच रहे होंगे कि जब गाँव इतना खुशहाल हो गया है, तो मैं क्यों दुखी हो रहा हूँ, अपनी बेगानगी को लेकर? सबकी खुशहाली देख, मैं क्यों खुश नहीं हो रहा हूँ? हमारे ग्रामीणजन तो मुझे 'दुष्ट प्रवृत्ति का आदमी' भी समझने लगेंगे!...

बहरहाल, मैं पूर्ववत दुखी हूँ और भौचक्क! विकास की इस अंधी और दिशाहीन दौड़ ने गाँव को पैसा ज़रूर दिया और उन पैसों से वे टीवी के विज्ञापन में दिखनेवाले अनेक उत्पाद भी खरीदने की स्थिति में आ गए हैं। लेकिन उनके खेत फिर से बंजर हो गए हैं या होते जा रहे हैं। अब वे अपने खेत की साग-सब्ज़ी कम और बाज़ार की सब्जि़याँ ज़्यादा खाते हैं। इलाज के लिए कई झोलाछाप डाक्टर भी आ गए हैं जानलेवा दवाइयों के साथ...। टोने-टोटके और अंधविश्वास भी पहले से ज़्यादा गहरे हुए हैं। ईश्वर के कई-कई ब्राण्डों की नई-नई दुकानें तो बढ़ीं ही, धार्मिक आयोजनों के बहाने शक्ति-प्रदर्शन भी बढ़े हैं। धर्म और जात-पात के बीच जितने मेल-मिलाप बढ़े, उससे ज़्यादा धर्म और जाति की राजनीति के समीकरण ने नए-नए अन्तर्कलह को जन्म दिए हैं। स्त्री शिक्षा पूर्ववत गौण रहे। मगर नारी उत्पीडऩ और दहेज चरम पर हैं। विवाहों में आडंबर और बर्बादी शहरी ढंग से ही अराजक रूप ले चला है।...

आँगन-दलान के बाड़े पर झिंगुनी के बेलों में पीले-पीले फूल आज भी मनोहारी लगते हैं। हरे-भरे पेड़, आम्र मंजरियों की मतवाली गंध और कोयल की कूक अभी पूरी तरह गायब नहीं हुई है। मेड़ों-एकपेडिय़ों से गुज़रते नीम-पाकड़ के नीचे सुस्ताते, नदी-नाले को जाते ग्रामीण जनों के खून का रंग पहले जैसा ही है। ऐसी ढेर सारी बातें पहले जैसी होने के बावजूद आज के ग्रामीण जनों के भीतर एक चालाक किस्म के शहरी की सम्पूर्ण धूर्तता-मक्कारी, लोभ-लालच, दाँव-पेंच के साथ ही गुड़ई के समस्त हथियार और औजार साधने का साहस अदभुत ढंग से विकसित हुआ है। अपनापे और भाईचारे की स्थिति यह है कि अब पड़ोसी के कुटुम्ब का अपमान लोगों को अदभुत सुख पहुँचाता है। अब बात-बेबात लाठी-भाले नहीं, कट्टे या कैमिकल हथियार का उपयोग किया जाता है। मुकदमे से बेहतर रास्ता आर्थिक नुकसान या सामाजिक प्रतिष्ठा हनन का अभियान लगता है।

यही कारण है कि आज हमारे गाँव के लोगों को जो लड़ाई लडऩी चाहिए, उसके लिए वे आगे नहीं आते। फलत: उनकी आर्थिक समृद्धि और बौद्धिक दरिद्रता दोनों साथ-साथ बढ़ रही हैं। जवाहर रोज़गार योजना के नाम पर हर साल कुछ खरंजा सड़कें और कुछ पुल बनते हैं और जल्दी ही ईंटें गायब हो जाती हैं। इसलिए आज तक यहाँ एक फूट भी पक्की सड़क नहीं बनी, न एक भी ढंग के पुल। बिजली भी नहीं आ पाई। हाँ, अब सायंकाल साझे जेनरेटरों की लाइट सप्लाई का नया फंडा ज़रूर आ गया है। इससे लोगों के मोबाइल चार्ज हो जाते हैं और बैट्री भी। सस्ता मनोरंजन, क्षणिक उत्तेजना मिलती रहे! न बने अस्पताल, न चले स्कूल! सड़क-स्कूल के बिना भी सुख का पुल बन ही रहा है।

ऐसे विषय काल में अपने ही गाँव में, मैं अजनबी की हैसियत में पहुँच चुका हूँ और अब उधर को जाने का मन नहीं कर रहा है, तो किसी को क्या फर्क पडऩेवाला है। पहले हर साल जाता था, अब दो-तीन साल पर एकाध रोज़ के लिए जाने पर भी कोई-न-कोई किसी-न-किसी बहाने अपमानित करने को तत्पर दिखता है। अब तो मेरे सगे भी मुझे अपनी ज़मीन से बेदखल करने को आगे आ गए हैं!...

दोस्तो, मैंने जिस गाँव की बात यहाँ रखी है उसकी सीमा से आपका जुड़ाव-लगाव भले न हो...मगर गौर करें कि उन बातों और विचारों का संबंध कहीं-न-कहीं आपके जुड़ाव-लगाव वाले गाँव से भी तो नहीं बनता है?...

  (यह डायरीनुमा टिप्पणी 14 जनवरी, 2011 को लिखी गई थी और 22 जनवरी, 2011 को कोलकाता के एक सम्मान-कार्यक्रम में वक्तव्य के रूप में प्रस्तुत की गई थी. फिर इसका कुछ अंश ''अमर उजाला'' में आया था और अभी-अभी ''वागर्थ'' के अगस्त अंक में ''छूट गए गाँव से एक पुकार'' शीर्षक से पाठकों को उपलब्ध है.)

Friday, 5 August 2011

अनुभव और अनुभूति पर बेदखली का संकट

सनगोह और सांप के बाद आप अनुमान कर रहे होंगे कि इस बार मैं किस जानवर के प्रसंग अपनी याद साझा करने आउंगा... लेकिन इस बार अनुभव से ज़रा दूर अनुभूति के कुछ प्रसंग यादों में झिलमिलाते आ रहे हैं.

यूं हमने जानवरों के बीच और उनके साथ रहते जो जीवन जिए और भोगे थे उससे काफी ज़्यादा गहरे विकट और जटिल जीवन हमारे बुजुर्गों ने जिया-देखा और भोगा था. अरना भैंसे, बनैया सूअर, चीते और लकड़बग्घे का आतंक तो हमारे बचपन के शुरुआती दिनों तक था ही... फिर भी जानवरों के साथ उनका जीवन जितना एडवेंचरस था उतना हमारा कहाँ? हमारे जीवन में अगर कुछ ख़ास बचा था तो यही कि हम अपने से पहले के अनुभव से कटे नहीं थे, हमारा संवाद अपने से पहले की पीढ़ियों से गहन से गहनतम ही रहा. लोक, परम्परा, अनुभव, ज्ञान आदि को हमने शास्त्रों से ज़्यादा जीवन से लेना बेहतर समझा. खैर...

बहरहाल, कई घटनाओं के बीच से एक वह घटना याद आ रही जो मेरे पिता के जीवन से जुड़ी है. वैसे इस प्रसंग में कुछ भी साझा करते एक संकोच हो रहा है कि आज के पाठक इस पर यकीन शायद ही करे! यह सच है कि अपने पिता के प्रति मैं बहुत ही सम्मान का भाव रखता हूँ, लेकिन ज़रा भी अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं...

मेरे पिता के पेट पर कई ऐसे निशान भरे पड़े थे जैसे अमूमन बड़े ऑपरेशन के बाद बन जाते हैं... जबकि उनका कोई बड़ा ऑपरेशन तो दूर, कभी किसी बड़े डाक्टरों के क्लिनिक भी उन्हें नहीं जाना पड़ा था. कोसी तब नई-नई बंधने लगी थी. वे गोविंदपुर से आ रहे थे. मिरचैया बढियाई और उछाल थी. हेलकर नदी पार करते समय वे किनारे से कुछ ही दूर थे कि एक मगरमच्छ ने कमर से ऊपर उनके पेट पर जबड़ा कस दिया. मिरचैया के पुरबी किनारे पर दो-तीन मछुआरे और मेरे बड़े काका(ताऊ) खड़े थे. उन्होंने जब मेरे पिता को धारा के साथ बहते और उगते-डूबते देखा, तो स्थिति का अनुमान कर बचाने को भागे. 

मगरमच्छ ने उन्हें इस तरह जबड़ों में दबोच लिया था कि किनारे से पानी के बाहर तक उसी स्थिति में दोनों को लाया गया. बाहर लाकर मगरमच्छ के जबड़ों के बीच दो मोटी-मोटी लाठी उन लोगों ने डाली... और एक लाठी से नीचले जबड़े को दबाकर दूसरे से उपरी जबड़े को अलगा कर उन लोगों ने मेरे पिता को बचाया था.

यह घटना मेरे जन्म से काफी पहले की है. मगर उस ज़ख्म के निशान उनकी मृत्यु तक थे ही. कई बार उन निशानों को छू कर हम उस घटना के बाबत उनसे तरह-तरह के सवाल करते जिज्ञासाओं से भर जाते थे. तब एक अजीब भय से देह में सिहरन सी होती थी. अब तो उनको गुजरे इक्कीस साल हो गए. उस घटना के बाबत कभी-कभार अपने बच्चों को बताता हूँ, जो कि अपने दादा को नहीं देख पाए हैं, तो ये दोनों मुझसे भी ज़्यादा भय से भरकर एक अजीब उदासी के बाबजूद स्मृति की इस यात्रा में मेरे सहयोगी बन जाते हैं... 


ऐसे डर-भय से भरे अनेक प्रसंग हैं जो मिरचैया के साथ जुड़ी हमारी स्मृति में टंकी हुई हैं, मगर तब भी मिरचैया हमारे लिए कभी डरावनी या बेगानी नहीं हुई. यूं तो हमारी तरफ नदियों को माता कहा जाता है, मगर मैंने हमेशा से इस नदी को प्रेमिका की तरह ही देखा और माना है. और मेरी वह प्रेमिका जो बीरपुर-बसमतिया के बीच हैय्या कहलाती, पूर्वी कोसी केनाल (नहर) पार करते मिरचैया बन हमारे इलाके को पार कर तिलाठी, छातापुर, कर्णपट्टी, डपरखा(त्रिवेणीगंज के पूरब से) तक यही नाम लिए आगे को कोसी में मिलकर गंगा की तरफ चली जाती है.

क्या इस नदी के किनारे मैंने और हमारे और भी साथियों ने सिर्फ जानवरों के साथ ही अनुभव समृद्ध किया था? क्या हमने प्रकृति और मानव मन के साझेपन को यहाँ से बेहतर कहीं और समझा था? दोस्तो, जीवन का सहज आनंद और प्रेम का सब से स्वस्थ फल मैंने यहीं तो चखा था और यहीं से आज मेरे बन्धु-बांधव बेदखल करना चाहते हैं.

Tuesday, 2 August 2011

सनगोह की याद और मिरचैया के लिए मेघ से प्रार्थना

मालूम हुआ कि पिछले कुछ दिनों से मिरचैया पलार क्षेत्र में खूब बारिस हो रही है. निश्चय ही अब भी थोड़े हरे कास बचे होंगे जो इस बरसात में पुराने दिनों के रंग भरते होंगे. लेकिन खैरों का वो विशाल वन नहीं होगा. उस खैरबन्ने को याद करने वाले जरूर हैं और वो उसको कभी कभार याद भी करते होंगे, लेकिन उस खैरबन्ने में नज़र आनेवाले सांप-सनगोह और उसके साथ जुड़े बच्चों के डर की याद किसी को शायद ही होगी!

सनगोह यूं तो सांप से कम खतरनाक जीव माना जाता, लेकिन बरसात के इस मौसम में उसकी आमद बढ़ जाती थी और एक प्रचलित डर भी था कि वह किसी को फूंक मार दे तो आदमी इतना ज़्यादा फुल जाता कि अरसे तक किसी काम का नहीं रहता. हम में से किसी को उसने कभी फूंक नहीं मारा था, लेकिन हम सांप की तरह ही उससे भी डरते थे... यूं सच पूछें तो तब उतना नहीं डरते थे जितना अब उसकी याद डरावनी लगाती है. डरते-डरते भी हम सनगोह को देखते तो उसको खदेड़ने या मारने के मौके छोड़ते नहीं थे.

हमने कई सनगोह मारे जिनमें से कई के खाल खालकर हमारे साथ का एक लड़का ले जाता था. वह लड़का उस खाल से खेजड़ी नामक एक वाद्य यंत्र बनाता था. उस खेजड़ी की मीठी आवाज़ सुन हम सनगोह के डर बिलकुल भूल जाते थे. डरावना सनगोह और उसके खाल की मीठी आवाज़ वाली खेजड़ी! क्या अब भी कोई वैसी खेजड़ी बनाता होगा?

सांप को लेकर वह डर अब भी बारिस के इस मौसम में मिरचैया पलार जाने पर ताज़ा हो जाता है, लेकिन सनगोह अब दिखाते ही कम हैं. क्या इस डर के साथ अब खेजड़ी जैसे लोक वाद्य यंत्र के ख़त्म होने का डर नहीं शुरू हो रहा है? ऐसे ढेर सारे डरों की गवाह नदी मिरचैया जो लगातार सूखती जा रही है इससे कोई क्यों नहीं डर रहा है?

इस बीच मिरचैया पलार की याद के साथ जब मुझे सनगोह की याद आई तो मैंने शब्दकोशों को खंगाला, मगर कहीं "सनगोह" शब्द नहीं मिला. गूगल पर भी खोजने का कोई परिणाम नहीं मिला. तब मुझे लगा कि हो ना हो किसी दिन मिरचैया का नाम भी ना गायब हो जाये! और अपनी पहली प्रेमिका नदी मिरचैया की यादें बचाने को मैं वेचैन हो गया... और बरसात के इस मौसम में मेघ महाराज से यह प्रार्थना करने के अलावा मेरे वश में कुछ नहीं कि,  हे मेघ!बिहार के पूर्वी इलाके में जहाँ कभी कोसी बहा करती थी और जहाँ कुछ साल पहले भी कोसी मैया तफरी करने बाढ़ का उपहार लेकर आई थी और जो मिथिला का सबसे उपेक्षित भदेस इलाका है वहां मेरी पहली और इकलौती प्रेमिका मिरचैया पानी के लिए तरस रही है, कृपा कर के तुम वहाँ खूब-खूब बरसो, जम के बरसो!....

Wednesday, 27 July 2011

उस सूखती नदी मिरचैया की याद में...

जब कालिकापुर में था तब हमारे पास सुकून के पल ज़्यादा थे. कलकल-छलछल बहती नदी मिरचैया मेरी प्रेमिका-सी थी और वह पलार हमारा अन्तरंग संसार जहाँ हम हर तरह से मस्त अनौपचारिक जीवन जीते थे. अभावों से भरा जीवन था, गाय-भैंस चराते खेती-बारी के साथ पढाई का समय कैसे निकालते थे अब सोचना तक कठिन लगता है. तब भीषण आभाव में भी हम इतने दुखी नहीं थे जितने आज तमाम महानगरीय सुविधाओं के बावजूद हम व्यस्त-परेशान होकर दुखी हैं ...और अपने दुःख के कारण को भी समझाने में जिस कदर असमर्थ हैं, यह तो और भी विचित्र और चिंताजनक बात है...
पिछले दिनों जयपुर में था. जयपुर एक राज्य की राजधानी है .आधुनिक नगरी. वहां भी जीवन बदल रहा है, मगर वह नगर दिल्ली की तुलना में कुछ कम संकरा है ... यह फर्क लम्बे समय तक बना रहेगा? यूँ तो वहां का साहित्यिक माहौल भी बेहतर है ... वहां के सक्रिय युवा रचनाकारों में मेलमिलाप, प्रेम, टीम भावना के साथ स्वस्थ्य  रचनात्मक माहौल मोहता है ... जब भी जयपुर जाता हूँ तो आत्मीय भावों से भर जाता हों, मन प्राण को सुकून मिलते हैं ... प्रायः यही बात रही होगी कि इस बार जयपुर से लौटते में अपने उन दिनों के कालिकापुर पलार से लौटने जैसा लग रहा था... उस दिन मौसम भी ज़रा भीगा था, बदरी छाई थी, पुरवैया गाछ-वृक्षों को झकझोरती बड़ी शान से बह रही थी और मेरा मन मुझे जैसे एसी वोल्वो बस से दूर कालिकापुर में मिरचैया पलार पर लिए जा रहा था ... मैं बस में होकर भी मिरचैया के कछार में था...
क्या यह सुकून दिल्ली में संभव है?
 नहीं , वो सुकून यहाँ  नहीं मिलेगा, मगर वो कालिकापुर भी अब वैसा नहीं मिलेगा... कालिकापुर भी अब बदल गया है. मैंने जिस कालिकापुर की कोमल भावना में पगी चर्चा की है, वह अब वहां भी नहीं है... बालपन में अभावों से भरी मेरी ज़िन्दगी को संवलित करनेवाला मेरा वह गाँव मर चूका है ... कोसी की भीषण बाढ़ के बावजूद नदी मिरचैया मरणासन्न है, जीवन में जैसे प्रेम सूख रहा वो नदी भी सूख रही है ...
उस सूखती नदी की याद में और अपने मरते गाँव के गम में जो दुःख भरी यादें हैं उन्हें बेतरतीव, बेधड़क, बेबाक आगे भी रखता रहूँगा ... यह ब्लॉग इसीलिए शुरू किया है... आप सब से सलाह-सुझाव की अपेक्षा  रहेगी...